Monday, June 17, 2019

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

पलटकर देखा तो दो डॉक्टर बिस्तर के आधे हिस्से में लेटी एक छोटी सी बच्ची के सीने को हिलाते हुए उसे ज़िंदा करने की कोशिश कर रहे थे. बच्ची सुन्न पड़ी थी. अचानक वार्ड में ज़ोर से हल्ला हुआ और दो महिलाएँ एदूसरे से लिपटकर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगीं.
वार्ड के बाहर बिछी कुर्सियों पर गिरकर रो रही उनमें से एक रूबी ख़ातून थीं. अंदर बिस्तर पर लेटी उनकी चार साल की बेटी तमन्ना ख़ातून की ज़िंदगी अपने किनारे पर खड़ी थीदीवार पर अपने दोनों हाथ पटककर चूड़ियां तोड़ते हुए रूबी के रुदन ने मुझे भी सुन्न कर दिया. पर उस पल में रूबी के दुःख की कोई थाह नहीं ले सकता. वह एक माँ थी जिसने शायद अपने बच्चे को हमेशा के लिए जाते हुए देख लिया था.
दुःख में डूबी यह माँ आगे बोलती है, "पिछले दो दिनों में इस अस्पताल से एक भी बच्चा ठीक होकर वापस नहीं गया है. सभी बच्चे मर कर ही वापस गए हैं. मेरी लड़की ने कोई लीची नहीं खाया था. हम रोटी बनाए थे वही खा के अच्छे से सो गयी थी. फिर सुबह उठाए तो नहीं उठी."
"हमने सोचा कि देर तक सोने का मन होगा तो छोड़ दिया उसे वहीं. फिर थोड़ी देर में देखा की घुटनों के बल बैठी हुई थी. हाथ-पैर उसके पूरे कांप रहे थे. फिर हम उसे तुरंत लेकर यहां अस्पताल आए. लेकिन अस्पताल में हालत सुधरी नहीं. डॉक्टर भी अपने में बात करते और चले जाते. मैंने क्या इसलिए लड़की को पाल पोसकर इतन बड़ा किया था कि एक दिन ऐसे ही चली जाए?"
वार्ड के सामने से गुज़रते हुए मैंने देखा की मरीज़ों के परिजन बोतलों में पानी भर भर कर ला रहे हैं. पूछने पर पता चला की पूरे मेडिकल कॉलेज में पीने के साफ़ पानी की व्यवस्था नहीं है. इस वजह से इनसेफ़िलाइटिस के मरीज़ों के परिजनों को भी अस्पताल के बाहर बने एक हैंडपम्प तक पानी भरने जाना पड़ता है.
एक ओर जहां मरीज़ हैंडपम्प के पानी के गंदा होने की शिकायत करते हुए मुझे मटमैला रंग का पानी दिखाते हैं वहीं अन्य परिवार बताते हैं की आर्थिक तौर पर खस्ताहाल वह बोतल बंद पानी ख़रीदने को मजबूर हैं. क्योंकि अस्पताल में पीने का पानी उपलब्ध नहीं है.
आज शाम को इसी अस्पताल में हुए एक प्रेस कोनफ़्रेस में बीबीसी के सवाल का जवाब देते हुए केंद्रीय स्वास्थ मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने कहा की इनसेफ़िलाइटिस के मरीज़ों के लिए पीने के पानी की उपलब्धता 'कोई क्रिटिकल इश्यू नहीं है.'
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