Thursday, April 4, 2019

वक़्त पर खाने से मोटापा हो सकता है कंट्रोल?

अंतरिक्ष में भेजे जाने वाले उपग्रहों में 'एंड ऑफ़ लाइफ' के लिए इतना ईंधन मौजूद होता है कि वो रॉकेट, उपग्रह को डिऑर्बिट किया जा सके, मतलब उन्हें नीचे लाकर ग्रेवयार्ड (क़ब्रिस्तान) ऑर्बिट में रखा जा सके ताकि नुक़सान कम-से-कम हों.
भारत अंतरिक्ष के मलबे को मल्टी ऑब्जेक्ट ट्रैकिंग रेडार से ट्रैक करता है. श्रीहरिकोटा के पास यह रेडार है, अमरीका के पास ऐसे कई रेडार हैं और वो इनकी सार्वजनिक सूचना साझा करते हैं.
अंतरिक्ष में मौजूद मलबे को इकट्ठा करने के लिए कुछ प्रयोग ज़रूर हुए हैं. इसमें नेट या हार्पुन लगाकर किसी तरह से मलबे को खींच कर उन्हें डीऑर्बिट किया जाए और वापस धरती पर लाकर जला दिया जाए, इसके प्रयोग किए गए हैं.
लेकिन यह कितने कारगर हैं या इस पर कितना खर्च आएगा अभी उस पर पूरी जानकारी नहीं है. आने वाले वक्त में सभी देशों को मिलकर इस पर ध्यान देना होगा.
अमरीका और रूस ने शुरुआत में जो प्रक्षेपण किए थे उसमें उन्होंने अंतरिक्ष के कचरे पर कोई ध्यान नहीं दिया गया था. भारत ने तो अभी हाल में ये प्रक्षेपण करना शुरू किया है.
भारत ने आउटर स्पेस समझौते पर हस्ताक्षर भी किए हैं. कचरा कम-से-कम हो भारतीय वैज्ञानिक इसकी कोशिश करते हैं.
भारत का इन-ऑर्बिट कचरा महज 80 के क़रीब है. वहीं अमरीका का चार हज़ार से अधिक और चीन का तीन हज़ार से ऊपर.
ऐसे में इंसान को आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित बनाने के लिए ज़रूरत है चमत्कार की. ऐसा चमत्कार, जो इन चुनौतियों से पार पाने में मदद करे. धरती पर प्रदूषण कम करे. पर्यावरण को नुक़सान पहुंचाने वाली चीज़ों का बेहतर क़ुदरती विकल्प बने.
अब ये चमत्कार तो क़ुदरत ही कर सकती है. वैज्ञानिकों को लगता है कि प्रकृति ने हमें वो नेमत दे रखी है. ज़रूरत है बस उसके फ़ायदों पर से पर्दा हटाने की.
कनाडा की टोरंटो यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक जिम एंडरसन के पैरों तले एक महादैत्य सो रहा है. ये दैत्य तब से धरती पर है, जब फारस के बादशाह जैक्सिस ने प्राचीन यूनानी राजाओं के ख़िलाफ़ जंग लड़ी थी. ये महादैत्य इतना विशाल है कि तीन ब्लू व्हेलों के वज़न से भी ज़्यादा भारी है. इसकी ख़ुराक़ इतनी है कि ये कई जंगलों को निगल चुका है.
ये विशाल जीव कोई यूनानी पौराणिक किरदार नहीं है. ये है एक मशरूम. जिम एंडरसन जिस जगह खड़े हैं, वो अमरीका के मिशिगन सूबे का जंगली इलाक़ा क्रिस्टल फाल्स है. एंडरसन यहां 30 बरस बाद आए हैं. तीन दशक पहले जब जिम यहां आए थे, तब उन्होंने इस मशरूम की खोज की थी. इसका वैज्ञानिक नाम है आर्मिलैरिया गैलिशिया. ये हनी मशरूम की नस्ल का कुकुरमुत्ता है.
ये मशरूम, अमरीका ही नहीं, एशिया और यूरोप में भी बड़े पैमाने पर पाया जाता है. ये जंगलों में सूख चुकी लकड़ियों-पत्तियों पर उगते हैं. इनकी मदद से जंगलों का कचरा जल्दी से सड़कर ख़त्म होने में मदद मिलती है. अक्सर ये कुकुरमुत्ता ज़मीन से नीचे आशियाना बनाता है. धरती के ऊपर इसके पीली-भूरी छतरियों के आकार वाले डंठल दिखते हैं. ये 10 सेंटीमीटर तक बढ़ जाते हैं.

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